तारीख बदली, चुनौतियां नहीं बदलीं: दिव्यांगों की जमीनी हकीकत

तारीख बदली, चुनौतियां नहीं बदलीं: दिव्यांगों की जमीनी हकीकत

रिहान ज़ैदी लेख

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस हर साल 3 दिसंबर को आता है और गुजर भी जाता है, लेकिन उसके साथ जुड़े सवाल, वादे और हकीकतें तारीख बदलने से खत्म नहीं होतीं। दिवस के बाद भी जब समाज की सड़कें वही सीढ़ियां बनी रहती हैं, सरकारी दफ्तरों के दरवाजे वही संकरे रहते हैं और सोच वही पुरानी दया या उपेक्षा में अटकी रहती है, तब यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या हमने इस दिवस से सच में कुछ सीखा। दिव्यांगता शरीर की नहीं, व्यवस्था और नजरिए की असफलता बन जाती है, जब बराबरी का अधिकार कागजों में सिमट कर रह जाता है और जमीन पर संघर्ष ही दिव्यांग व्यक्ति की पहचान बन जाता है।

दिव्यांग व्यक्ति की सबसे बड़ी लड़ाई उसकी अक्षमता से नहीं, बल्कि उस समाज से होती है जो उसे पहले कमजोर मान लेता है और बाद में अवसरों से दूर कर देता है। स्कूलों में समावेशी शिक्षा की बातें होती हैं, लेकिन रैम्प, संसाधन और प्रशिक्षित शिक्षक आज भी अपवाद बने हुए हैं। रोजगार में आरक्षण का प्रावधान है, पर नियुक्ति से पहले ही मानसिक दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। सार्वजनिक परिवहन, अस्पताल, न्यायालय और कार्यालय—हर जगह दिव्यांग व्यक्ति को खुद को साबित करने से पहले रास्ता तलाशना पड़ता है। यही वह बिंदु है जहां संवैधानिक समानता व्यवहार में असमानता बन जाती है।

दिव्यांगजन दिवस के बाद यह आत्ममंथन जरूरी है कि हम अब भी दिव्यांगों को सहानुभूति के पात्र के रूप में क्यों देखते हैं, नागरिक के रूप में क्यों नहीं। ‘बेचारा’ कह देना जितना आसान है, उतना ही खतरनाक भी, क्योंकि यह शब्द क्षमता को नहीं, कमजोरी को केंद्र में रखता है। दिव्यांग व्यक्ति समाज पर बोझ नहीं, बल्कि वह संसाधन है, जो अवसर मिलने पर अपनी प्रतिभा, श्रम और अनुभव से समाज को समृद्ध कर सकता है। जरूरत इस बात की है कि तालियों और मंचीय कार्यक्रमों से आगे बढ़कर सुलभता, सम्मान और अवसर की ठोस व्यवस्था बनाई जाए।

सरकारी योजनाएं, कानून और अधिकार तभी सार्थक होंगे जब उनकी पहुंच आखिरी व्यक्ति तक होगी। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में दिव्यांग प्रमाणन, सहायक उपकरण, पुनर्वास और स्वास्थ्य सेवाएं आज भी चुनौती बनी हुई हैं। परिवारों पर आर्थिक और मानसिक बोझ बढ़ता है और व्यवस्था की सुस्ती इस बोझ को और भारी कर देती है। दिव्यांगजन दिवस गुजर जाने के बाद भी अगर ये सवाल जस के तस खड़े हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि उत्सव तो हुए, लेकिन जिम्मेदारी निभाने में हम चूक गए।

यह समय है कि दिव्यांगता को ‘विशेष मामला’ नहीं, बल्कि नीति और नियोजन का स्थायी हिस्सा माना जाए। हर सड़क, हर इमारत, हर स्कूल और हर दफ्तर दिव्यांग-अनुकूल हो—यह कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि बराबरी का अधिकार है। समाज को यह समझना होगा कि सशक्तिकरण दया से नहीं, सम्मान और अवसर से आता है। जब तक दिव्यांग व्यक्ति बिना संघर्ष के शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह नहीं बना पाता, तब तक हर साल आने और गुजर जाने वाला दिव्यांगजन दिवस हमें हमारे दायित्वों की याद दिलाता रहेगा। असली सफलता उस दिन होगी, जब किसी दिव्यांग नागरिक को अपनी क्षमता साबित करने से पहले व्यवस्था से लड़ना नहीं पड़ेगा, और समानता केवल शब्द नहीं, एक जीती-जागती सच्चाई बन जाएगी।

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