गाजियाबाद पत्रकार-पुलिस विवाद मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई जरूरी : रिहान ज़ैदी

गाजियाबाद में पत्रकारों और पुलिस के बीच विवाद का मामला अब बड़ा आंदोलन बनता जा रहा है। पूरे प्रकरण की शुरुआत उस समय हुई जब पत्रकार सुमन मिश्रा के साथ कथित अभद्रता की घटना को लेकर शिकायत दर्ज कराने के लिए पत्रकार साथी सिद्धार्थ विहार स्थित जल निगम पुलिस चौकी पहुंचे। आरोप है कि चौकी प्रभारी के बुलावे पर पहुंचे पत्रकारों के सामने विपक्षी पक्ष के लोग भी मौजूद थे और बातचीत के दौरान माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस की मौजूदगी में ही विपक्षी लोगों द्वारा गाली-गलौज और दबाव बनाया गया, लेकिन उन्हें रोकने के बजाय चौकी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने ही पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार शुरू कर दिया। आरोपों के अनुसार, ‘भारत का बदलता शासन’ समाचार पत्र के संपादक ललित चौधरी के साथ कथित रूप से धक्का-मुक्की की गई, उन्हें जबरन पुलिस वाहन में बैठाया गया और मारपीट की गई। यह भी आरोप लगाया गया कि सब-इंस्पेक्टर आयुष कुमार सहित कुछ पुलिसकर्मियों ने अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए पत्रकारों को धमकाया। घटना के बाद पत्रकार अपूर्वा चौधरी और अन्य साथी थाना विजयनगर पहुंचे, जहां उन्होंने थाना प्रभारी धर्मपाल से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि वहां भी उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें धमकाकर बाहर कर दिया गया। इसके बाद मामले की शिकायत एसीपी उपासना पांडेय, डीसीपी सिटी और पुलिस कमिश्नर कार्यालय तक पहुंचाई गई। 21 मई को पुलिस आयुक्त को लिखित ज्ञापन भी सौंपा गया, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी कार्रवाई न होने का आरोप लगाया गया। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने न्याय न मिलने से आहत होकर अन्न त्यागने का ऐलान कर दिया। बताया गया कि वह केवल पानी के सहारे हैं। इसी बीच पत्रकार संगठनों ने आरोप लगाया कि आंदोलन और विरोध को रोकने के लिए कुछ पत्रकारों को कथित तौर पर हाउस अरेस्ट भी किया गया। इसके बाद गाजियाबाद के पत्रकारों में भारी आक्रोश फैल गया और बुधवार 27 मई से पुलिस कमिश्नर कार्यालय पर अनिश्चितकालीन आंदोलन का ऐलान कर दिया गया। आंदोलन कर रहे पत्रकारों की मुख्य मांगों में दोषी पुलिसकर्मियों और कथित साजिशकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने, पत्रकारों पर दर्ज कथित झूठे मुकदमों को वापस लेने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच शामिल है। पत्रकारों का कहना है कि यदि वे दोषी हैं तो उन्हें जेल भेजा जाए, लेकिन यदि आरोप सही हैं तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। पूरा मामला अब सोशल मीडिया पर भी तेजी से चर्चा में है। पत्रकार संगठनों और मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ किसी भी प्रकार का उत्पीड़न गंभीर विषय है और निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई सामने आनी चाहिए। वहीं पुलिस प्रशासन की ओर से इस पूरे प्रकरण में आधिकारिक जांच और कार्रवाई को लेकर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।

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