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Showing posts from December, 2025

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल  गाजियाबाद। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर ‘सैल्यूट तिरंगा’ द्वारा आयोजित ‘अटल तिरंगा सम्मान–2025’ समारोह में गाजियाबाद की निर्भीक पत्रकार अपूर्वा चौधरी को सम्मानित किया जाएगा। यह भव्य आयोजन 26 दिसंबर 2025 को एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर, नई दिल्ली में प्रस्तावित है, जहां संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश झा के नेतृत्व में देशभर से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले 30 विशिष्ट व्यक्तियों को सम्मान प्रदान किया जाएगा। अपूर्वा चौधरी दैनिक समाचार पत्र ‘भारत का बदलता शासन’ की समाचार संपादक हैं और एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनकी पत्रकारिता केवल खबरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के उन वर्गों की आवाज़ बनने का प्रयास किया है, जिनकी पीड़ा और सवाल अक्सर हाशिये पर छूट जाते हैं। सत्ता, व्यवस्था और प्रशासन के बीच आम नागरिक के अधिकारों को सामने लाने में उनकी भूमिका को गाजियाबाद के पत्रकारिता जगत में विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और निर...

काग़ज़ और सिक्कों पर छिपी बीमारियों का खतरा

काग़ज़ और सिक्कों पर छिपी बीमारियों का खतरा लेखक:  रिहान ज़ैदी, बढ़ापुर हम अक्सर नोट और सिक्कों को अपनी जेबों, बटुओं और हाथों से छूते रहते हैं। कभी दुकान पर लेन-देन में, कभी ऑटो या रिक्शे का किराया देने में और कभी बच्चों की टॉफी खरीदने में। लेकिन शायद ही हममें से कोई यह सोचता हो कि इन कागज़ी नोटों और धातु के सिक्कों पर कितनी बीमारियाँ पल रही होती हैं। विज्ञान की मानें तो नोट और सिक्के सबसे ज्यादा गंदे सामानों में गिने जाते हैं, क्योंकि ये हर हाथ से होकर गुजरते हैं। कोई व्यक्ति बीमार है, उसे जुकाम या खांसी है, उसने वही नोट छुआ और फिर वही नोट दर्जनों हाथों से होते हुए हमारे पास पहुँचा—इस पूरी प्रक्रिया में कितने ही वायरस और बैक्टीरिया हमारी हथेलियों तक आ जाते हैं। यही कारण है कि कागज़ और सिक्के इन्फेक्शन फैलाने के सबसे आसान जरियों में माने जाते हैं। दुनिया भर की शोधों में पाया गया है कि नोटों पर ई.कोलाई, स्टेफाइलोकोकस और साल्मोनेला जैसे खतरनाक जीवाणु मौजूद होते हैं, जो पेट और आंत की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। वहीं सिक्कों की धातु पर अक्सर फंगस और वायरस लंबे समय तक जीवित रहत...

तारीख बदली, चुनौतियां नहीं बदलीं: दिव्यांगों की जमीनी हकीकत

तारीख बदली, चुनौतियां नहीं बदलीं: दिव्यांगों की जमीनी हकीकत रिहान ज़ैदी लेख अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस हर साल 3 दिसंबर को आता है और गुजर भी जाता है, लेकिन उसके साथ जुड़े सवाल, वादे और हकीकतें तारीख बदलने से खत्म नहीं होतीं। दिवस के बाद भी जब समाज की सड़कें वही सीढ़ियां बनी रहती हैं, सरकारी दफ्तरों के दरवाजे वही संकरे रहते हैं और सोच वही पुरानी दया या उपेक्षा में अटकी रहती है, तब यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या हमने इस दिवस से सच में कुछ सीखा। दिव्यांगता शरीर की नहीं, व्यवस्था और नजरिए की असफलता बन जाती है, जब बराबरी का अधिकार कागजों में सिमट कर रह जाता है और जमीन पर संघर्ष ही दिव्यांग व्यक्ति की पहचान बन जाता है। दिव्यांग व्यक्ति की सबसे बड़ी लड़ाई उसकी अक्षमता से नहीं, बल्कि उस समाज से होती है जो उसे पहले कमजोर मान लेता है और बाद में अवसरों से दूर कर देता है। स्कूलों में समावेशी शिक्षा की बातें होती हैं, लेकिन रैम्प, संसाधन और प्रशिक्षित शिक्षक आज भी अपवाद बने हुए हैं। रोजगार में आरक्षण का प्रावधान है, पर नियुक्ति से पहले ही मानसिक दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। सार्वजनिक परिवहन, ...