पहाड़ों में हो रही लगातार बारिश ने पूरे जिले की स्थिति बिगाड़ दी है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है

बढ़ापुर। पहाड़ों में हो रही लगातार बारिश ने पूरे जिले की स्थिति बिगाड़ दी है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। न अधिकारी अनजान हैं, न आम जनता। लेकिन बिजनौर के कस्बा बढ़ापुर के एक गांव छायली की स्थिति ऐसी है, जिसे सुनकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। यह वह जगह है जहां पानी केवल बरसात में नहीं बहता, बल्कि लोगों के जीवन, उम्मीदों और सपनों को भी बहा ले जाता है। बारिश का पानी जब छायली पहुंचता है तो केवल खेतों को डुबोता नहीं, बल्कि गांव की रोज़मर्रा की जिंदगी पर गहरा असर डालता है। बरसात थमती है, लेकिन लोगों का संघर्ष लगातार जारी रहता है। यहां पानी केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही प्रशासनिक चुनौतियों का भी परिचायक है। साल 2023 में इस गांव के छात्र नदी पार न कर पाने की मजबूरी में नदी किनारे ही तिरंगा लहराकर आज़ादी का जश्न मनाए थे। जश्न तो हुआ, लेकिन वह खुशी फिर कभी वापस नहीं आई। 2025 में भी हालात यथावत हैं। 15 अगस्त को फिर से बच्चे पानी में झंडा लहराने को मजबूर हैं। साल बीतते जा रहे हैं, मगर ग्रामीणों की आवाज़ें आज भी इस पानी को पार कर के किसी के कान तक नहीं पहुंच पा रही हैं। गांव वाले उस पानी से आज़ादी महसूस नहीं कर पा रहे, जो उनके पैरों की जंजीर बन चुका है। जश्न-ए-आज़ादी के नारे अब यहां के लोगों के लिए व्यंग्य की तरह लगते हैं, क्योंकि उनका हर दिन का संघर्ष ही असली लड़ाई है। दलदली रास्तों से गुजरना, कीचड़ में डूबे कपड़ों और जूतों के साथ नदी की तेज धारा को पार करना। यही इस गांव की हकीकत है। आज़ादी की बातें करने वाले कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि भारत के नक्शे में कस्बा बढ़ापुर के पास ‘छायली’ नाम का भी एक गांव है। अगर यह भूल नहीं होती, तो यह पानी तरक्की की सबसे बड़ी बाधा न बनता।मंगलवार को स्थिति बिगड़ने पर थाना प्रभारी मृदुल कुमार ने एनडीआरएफ की टीम को बुलाया, जिसकी ग्रामीणों ने राहत की सांस के रूप में सराहना की। पर यह राहत केवल कुछ घंटे की ही थी, क्योंकि स्थायी समाधान की जगह यहां केवल अस्थायी इंतज़ाम और अधूरे वादे हैं। ग्रामीणों की आवाज़ साफ़ है। हमें नाव नहीं, पुल चाहिए। जांच नहीं, समाधान चाहिए। हर बार अधिकारी आते हैं, कागज़ों में रिपोर्ट बनाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। लेकिन सवाल आज भी बरकरार है। आखिर पुल क्यों नहीं बन पाया? किसके आदेश का इंतज़ार है? कब तक तेज बहाव किसी बीमार की जान, किसी दूल्हे की बारात या किसी मासूम की सांसें छीनता रहेगा? इतने हादसों और आंसुओं के बाद भी अगर पुल नहीं बना तो क्या और बड़ी त्रासदी का इंतज़ार करना होगा?

Comments

Popular posts from this blog

📸 विश्व फोटोग्राफी दिवस: हर तस्वीर में एक कहानी , हर तस्वीर अपने आप में एक दुनिया बयां करती हैं

तारीख बदली, चुनौतियां नहीं बदलीं: दिव्यांगों की जमीनी हकीकत

गाजियाबाद पत्रकार-पुलिस विवाद मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई जरूरी : रिहान ज़ैदी