काग़ज़ और सिक्कों पर छिपी बीमारियों का खतरा

काग़ज़ और सिक्कों पर छिपी बीमारियों का खतरा
लेखक: 
रिहान ज़ैदी, बढ़ापुर

हम अक्सर नोट और सिक्कों को अपनी जेबों, बटुओं और हाथों से छूते रहते हैं। कभी दुकान पर लेन-देन में, कभी ऑटो या रिक्शे का किराया देने में और कभी बच्चों की टॉफी खरीदने में। लेकिन शायद ही हममें से कोई यह सोचता हो कि इन कागज़ी नोटों और धातु के सिक्कों पर कितनी बीमारियाँ पल रही होती हैं। विज्ञान की मानें तो नोट और सिक्के सबसे ज्यादा गंदे सामानों में गिने जाते हैं, क्योंकि ये हर हाथ से होकर गुजरते हैं। कोई व्यक्ति बीमार है, उसे जुकाम या खांसी है, उसने वही नोट छुआ और फिर वही नोट दर्जनों हाथों से होते हुए हमारे पास पहुँचा—इस पूरी प्रक्रिया में कितने ही वायरस और बैक्टीरिया हमारी हथेलियों तक आ जाते हैं। यही कारण है कि कागज़ और सिक्के इन्फेक्शन फैलाने के सबसे आसान जरियों में माने जाते हैं।

दुनिया भर की शोधों में पाया गया है कि नोटों पर ई.कोलाई, स्टेफाइलोकोकस और साल्मोनेला जैसे खतरनाक जीवाणु मौजूद होते हैं, जो पेट और आंत की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। वहीं सिक्कों की धातु पर अक्सर फंगस और वायरस लंबे समय तक जीवित रहते हैं। कई बार हम बिना सोचे-समझे यही नोट छूकर आंखों, मुंह या नाक तक हाथ ले जाते हैं और संक्रमण हमारे शरीर में दाखिल हो जाता है। यही कारण है कि नोट और सिक्के हेपेटाइटिस, डायरिया, सर्दी-खांसी और त्वचा संबंधी रोगों तक के वाहक बन जाते हैं।

दुखद यह है कि हम रोज़ाना इन्हें छूते हैं, लेकिन सावधानी शायद ही बरतते हैं। कोई दुकान पर नोट को गिनते हुए थूक लगाता है, कोई बच्चा इन्हें खिलौने की तरह इस्तेमाल करता है और कोई इन्हें भोजन के बर्तन के पास रख देता है। ऐसे में बीमारी का खतरा और बढ़ जाता है।आज जब दुनिया डिजिटल हो रही है और लेन-देन मोबाइल वॉलेट और ऑनलाइन माध्यम से बढ़ रहा है, तो यह बदलाव हमारी सेहत के लिए भी राहतभरा है। फिर भी नकदी का इस्तेमाल खत्म नहीं हुआ है और शायद निकट भविष्य में खत्म भी नहीं होगा। इसलिए सबसे जरूरी है कि हम सावधान रहें—नोट या सिक्के छूने के बाद हाथ धोएं या सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें, बच्चों को इन्हें छूने से बचाएँ, और इन्हें खाने-पीने की चीज़ों के पास रखने की आदत बदलें।दरअसल, बीमारी का बड़ा कारण हमेशा हमारे आस-पास ही छिपा होता है और नोट-सिक्के उसी का जीता-जागता उदाहरण हैं। यह हमें याद दिलाते हैं कि स्वच्छता केवल घर और गली तक ही सीमित नहीं, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार में भी होनी चाहिए। हाथ की यह छोटी-सी आदत हमें बड़ी बीमारी से बचा सकती है। अक्सर लोग मानते हैं कि नकदी तो हर रोज़ सबके हाथ में घूमती रहती है, इसमें क्या होगा लेकिन सच यह है कि नोट और सिक्के कभी भी धोए या सैनिटाइज नहीं होते, जबकि बर्तन, कपड़े, घर की चीज़ें तो रोज़ साफ़ होती हैं। यानी हमारे जेब में रखा नोट महीनों तक दर्जनों लोगों के हाथ से होकर गुजरता है और उसमें जमे कीटाणु वहीं के वहीं रह जाते हैं। दूसरी अहम बात यह है कि बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज़्यादा ख़तरे में रहते हैं, क्योंकि बच्चे अक्सर नोट या सिक्के मुँह तक ले जाते हैं और बुज़ुर्गों की इम्युनिटी कमज़ोर होती है। इसके अलावा दुकानदार, सब्ज़ी बेचने वाले, या रोज़मर्रा में नकदी से काम करने वाले लोग सबसे ज़्यादा जोखिम उठाते हैं, क्योंकि उन्हें हर समय गंदे नोटों से सीधा सामना करना पड़ता है।और सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद ग्रामीण इलाकों में नकदी का इस्तेमाल अब भी सबसे ज़्यादा है, जहाँ सफाई और हैंडवॉश जैसी आदतें कम अपनाई जाती हैं। इस वजह से बीमारी का फैलाव और तेज़ हो जाता है। इसीलिए ज़रूरत है कि हम नकदी को छूने के बाद हाथ धोने की आदत डालें और जहाँ संभव हो, डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दें।

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